शनिवार, 30 अप्रैल 2016

                               जिन आँखों ने आज़ादी का सपना देखा और जिन्होंने आज़ाद भारत में साँस ली उन्हें लगा कि सरकार बदलने से सारी चीज़ें बदल जाएँगी, पर क्या ऐसा हुआ? इन दशकों में एक मुहावरा हमारे सच में बदल गया कि अंग्रेज तो चले गए पर अंग्रेजी छोड़ गए। विश्व की दूसरी सबसे ज़्यादा समझी जाने वाली भाषा होने के बावज़ूद हिंदी आज महज़ एक संपर्क भाषा बनकर रह गई है। हमारे अपने ही देश में उसका स्थान दोयम रहा है और उसे उससे भी नीचे करने में हमने-आपने कोई कसर नहीं छोड़ी है। हमने मान लिया है कि हिंदी भाषा में शिक्षा प्राप्त करने से कुछ नहीं हो सकेगा। स्कूली शिक्षा में हिंदी एक भाषा के तौर पर स्वीकार्य है पर वह भी दूसरी या तीसरी भाषा के तौर पर, जिसका स्थान निश्चित ही अंग्रेजी के बाद और कई बार प्रांतीय भाषा के भी बाद आता है। केवल हिंदी के दम पर आप डॉक्टर-इंजीनियर नहीं बन सकते। यह भी छोड़िए, आप हिंदी सिनेमा तक में केवल हिंदी के बूते पर काम नहीं पा सकते।

                               हम सोचते हैं सरकार के जिम्मे है कि वह हिंदी को प्रतिष्ठा दिलाए। सरकार कितना भी दम लगा ले और कितने ही सर्कुलर (परिपत्र) जारी कर दें लेकिन सरकारी बाबुओं से हिंदी में काम नहीं करवा सकती। सरकारी तंत्र हिंदी राजभाषा मास मना सकता है, हिंदी मास, पखवाड़ा या सप्ताह-दिवस आयोजित कर सकता है, उससे अधिक कुछ नहीं। मंचों से मोदी जी हज़ार बार बोलते रहे लेकिन किसी बच्चे के अभिभावक अपने बच्चे को अंग्रेजी माध्यम से निकालकर हिंदी माध्यम के स्कूल में नहीं डालने वाले।

                                यहाँ यह भी सोचने वाली बात है कि हिंदी का उत्थान उसके रोजगार मूलक होने से अलग बात है। जिसे राज्य सरकारें कर सकती है या फिर निजी क्षेत्र। पर राज्य सरकारों का दायरा सीमित है वे या तो मजदूर श्रेणी के पदों पर उन लोगों को ले सकती है, जिन्हें केवल हिंदी आती है या कम वेतन के पदों को हिंदी माध्यम से शिक्षा प्राप्त छात्रों के लिए आरक्षित कर सकती है, इससे अधिक कुछ कर पाना उनके लिए संभव नहीं। ऐसे में सारा दारोमदार निजी क्षेत्र पर आता है। हिंदी के समाचार पत्र हों या हिंदी धारावाहिक या हिंदी फिल्मेंउन तमाम स्थानों पर हिंदी भाषा महज़ एक उपभोग की वस्तु बनकर रह गई है। यहाँ काम करने वालों और उसके दम पर रोजी-रोटी कमाने वालों को न तो हिंदी के संवर्धन से कुछ मतलब है न उसके संरक्षण की चिंता है। सार्वजनिक और निजी जीवन में उन पर अंग्रेजी इस कदर हावी हो गई है कि अब उनसे कुछ भी उम्मीद करना बेकार है।

                                जो लोग हिंदी के तथाकथित उत्थान की बातें करते हैं वे भी अपने स्वाक्षर (सही) हिंदी में करने या सरकारी/ निजी वेबसाइट या अन्य तत्सम सुविधाओं को हिंदी भाषा में उपलब्ध कराने के आगे नहीं सोच पा रहे। हिंदी के मानक और पारिभाषिक शब्दों को इतना क्लिष्ट कर दिया गया है कि वे आम लोगों की पहुँच से और दूर हो गए हैं। जैसा कि ऊपर लिखा सर्कुलर इतना आम शब्द हो गया है कि उसके एवज में परिपत्र को समझना कठिन लगता है। ज़रूरत मूलभूत या आधारभूत बदलाव को करने की है जो ज़मीन से जुड़े भी और उससे ऊपर उठे भी लेकिन ऐसे मुद्दों पर विचार ही नहीं हो रहा है। जितने बदलाव हो रहे हैं वे केवल सांकेतिक-लाक्षणिक हैं ; आप अपना नाम हिंदी में लिखिए, फलों-फूलों के नाम हिंदी में लीजिए, अपने बच्चों से हिंदी में बात कीजिए….अच्छी कोशिशें हैं लेकिन इनसे हिंदी का भविष्य उज्ज्वल होने से रहा। फेसबुक और ट्विटर पर चर्चा कर लीजिए, मोर्चें निकाल लीजिए, दूसरे देशों यथा चाइना-कोरिया-जापान के उदाहरण दे दीजिए, लेकिन यह सब वैसा ही है जैसे अंग्रेजों की संसद में बैठकर भारत की स्वतंत्रता की बातें करना।

                                   हिंदी का सबसे बड़ा नुक्सान बाज़ार ने किया। उसे कगार पर ला छोड़ा है। हिंदी का मार्केट (बाज़ार) ही नहीं बन पा रहा। जिस दिन लगेगा कि यह बाज़ार की भाषा है, इस भाषा में बात करने पर ही कुछ बेचा जा सकता है तुरंत हिंदी काबिज हो जाएगी। अभी तो मानस में यह बैठा दिया गया है कि हिंदी मतलब लोअर क्लासऔर अंग्रेजी मतलब एलिट क्लास। आपको उच्च-संभ्रात लोगों की पंक्ति में शामिल होना है तो अंग्रेजी बोलिए, अंग्रेजी ही पहनिए, खाईए-पीजिए। सरकार और समाज की अनदेखी आज उसे आईसीयू (ICU- गहन चिकित्सा कक्ष) में ले जा चुकी है।

                                    सोशल मीडिया के इस युग में आवश्यकता इस बात की है कि हिंदी का अपना एक मंच तैयार हो सकें जहाँ हिंदी भाषा प्रेमी प्रचुर  संख्या में जुड़ सके और फिर यह मंच निजी क्षेत्र में बदलाव लाने की दिशा में कार्य कर सकें। वह हिंदी का उपभोग करने वाले हिंदी के मनोरंजन उद्योग को मजबूर कर सकें कि उसे हिंदी को पूरे तरीके से अपनाना पड़ जाए। जब हिंदी को संपूर्ण तरीके से अपनाया जाएगा तो परिवर्तन निश्चित होगा। लेकिन इसमें भी दिक्कत यह है कि हिंदी के बारे में वे लोग सोच रहे हैं जिनके  पास सोशल मीडिया की उतनी ही समझ है जितनी आज के बच्चों को टाइपराइटर की। नतीजन हिंदी के शुभचिंतक  सोशल मीडिया से होने वाली क्रांति से अनभिज्ञ, अनजान है। जो किया जा रहा है वह या तो बहुत सतही है या लक्ष्य बहुत सीमित या छोटे हैं।

                                       इन हालातों में समाधान मुश्किल है क्योंकि नया मीडिया हिंदी के लिए हारा जा चुका है या उसका संचालन विदेशी लोगों (ट्विटर / फेसबुक) द्वारा हो रहा है। जब हथियार ही डाल दिए हो तो लड़ाई कैसे जीती जा सकेगी? समझना होगा कि हिंदी हमारी कमज़ोरी नहीं, हमारी ताकत है। तीसरी दुनिया के सबसे बड़े बाज़ार यदि हम है और हमारी भाषा यदि हिंदी है तो वह पीछे रह ही कैसे सकती है? यदि एक मंच से सब मिलकर आवाज़ देंगे कि हमें अपनी भाषा में ही काम चाहिए और उसी में हमें काम करना है तो बाज़ार को हमारे अनुरूप होना ही होगा।

हमारी भाषा ही हमारी पहचान होती है।


ऐसे में ज़रूरत है नई सोच की…...  जारी .......